दिल्ली से देहरादून तक जहरीली हवा, देहरादून का AQI पहुंचा 300 पार

जिन पहाड़ों की ठंडी हवा और साफ आसमान देखने लोग दूर दूर से आते हैं, वहीं अब मास्क और जलन भरी आंखें नई हकीकत बनते जा रहे हैं। देहरादून की सड़कों पर सुबह की सैर करने निकले लोग अब ताजी हवा की जगह धुएं और धूल से भरी हवा में सांस ले रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि कभी साफ माने जाने वाला दून अब हवा की गुणवत्ता के मामले में कानपुर और पटना जैसे बड़े प्रदूषित शहरों से भी आगे निकल गया है। ताजा आंकड़ों में शहर का एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी AQI 300 के पार दर्ज हुआ, जो बेहद खराब श्रेणी में आता है।​

देहरादून में कुछ ही दिनों में वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। AQI 300 के पार जाकर कानपुर और पटना से भी ज्यादा खराब हुआ। जानिए कब बढ़ रहा है पलूशन, क्या कह रहे विशेषज्ञ और तंदूर, गाड़ियों व शादियों की क्या भूमिका है।​

देहरादून का AQI 300 के पार कब और कितना खराब

पिछले एक महीने तक देहरादून का औसत AQI 70 से 80 के बीच रहा, जो मध्यम स्तर माना जाता है। अधिकतम स्तर भी 170 के आसपास रुक रहा था। लेकिन पिछले दो तीन दिनों से तस्वीर अचानक बदल गई। मंगलवार की रात शहर में अधिकतम AQI 300 ग्राम प्रति घन मीटर से ऊपर पहुंच गया, जबकि बुधवार सुबह तक औसत AQI 140 से ऊपर दर्ज किया गया। यह स्तर कानपुर, पटना और प्रयागराज जैसे शहरों से भी ज्यादा खराब रहा।​

राष्ट्रीय मानकों के अनुसार AQI 200 से 300 खराब और 300 से ऊपर बेहद खराब श्रेणी में आता है। ऐसे स्तर पर लंबे समय तक रहने से सांस लेने में दिक्कत, आँखों में जलन, दमा, दिल की बीमारियाँ और बच्चों व बुजुर्गों के लिए खास खतरा बढ़ जाता है।​

रात में क्यों बढ़ रहा है पलूशन

रोजमर्रा के आंकड़े दिखा रहे हैं कि प्रदूषण का स्तर खासकर रात 11 बजे से सुबह 4 बजे के बीच तेजी से बढ़ता है। मंगलवार और बुधवार की रातों में AQI अधिकतम 300 तक पहुंचा, जबकि दिन में धूप निकलने और हल्की हवा चलने से थोड़ा सुधार दिखा।​

वैज्ञानिक बताते हैं कि सर्दी बढ़ने पर हवा ठंडी और भारी हो जाती है, जिससे प्रदूषित कण जमीन के पास ही फंसे रहते हैं और ऊपर की परत तक नहीं उठ पाते। रात में तापमान और गिरने से यह परत और नीचे बैठ जाती है, इसलिए रात के समय हवा ज्यादा जहरीली महसूस होती है।​

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विशेषज्ञ क्या कह रहे दून यूनिवर्सिटी की चेतावनी

दून विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के प्रमुख प्रोफेसर विजय श्रीधर के अनुसार तापमान में लगातार गिरावट और हवा की ऊंचाई कम होने से प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। ठंडी हवा ऊपर उठ नहीं पाती, जिससे सारी धूल, धुआं और जहरीले कण शहर के ऊपर ही जमे रहते हैं।​

इसके साथ ही बायोमास बर्निंग यानी लकड़ी, पत्तों, कचरा और कोयला जलाना, सड़कों की धूल, निर्माण स्थलों की मिट्टी और बढ़ती गाड़ियों का धुआं भी बड़ी वजह हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अभी से ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले हफ्तों में स्थिति और खराब हो सकती है।​

तंदूर और भट्ठियां बड़ा छुपा हुआ कारण

देहरादून जैसे शहर में भी होटलों, ढाबों, रेस्टोरेंट और बेकरियों के तंदूर व भट्ठियां हवा को तेजी से खराब कर रही हैं। अनुमान है कि शहर में रोजाना करीब एक हजार तंदूर और छोटी भट्ठियां जलती हैं, जो लकड़ी, कोयला या पैट कोक पर चलती हैं।​

विशेषज्ञों के अनुसार अगर एक तंदूर लगभग पांच घंटे तक दस किलो लकड़ी के साथ जलता है तो करीब 50 ग्राम प्रति घन मीटर तक सूक्ष्म प्रदूषित कण हवा में छोड़ सकता है। जब यह संख्या हजार के आसपास पहुंचती है तो कुल मिलाकर बहुत बड़ा धुआं और कण हवा में जमा हो जाते हैं। कोयला और पैट कोक जलाने से यह स्तर और अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि इनसे निकलने वाला धुआं ज्यादा जहरीला होता है।​

जाम में फंसी गाड़ियां चार गुना ज्यादा धुआं

वाहनों का धुआं भी देहरादून की हवा को भारी कर रहा है। शहर की सड़कों पर बढ़ता ट्रैफिक, खासतौर पर जाम और धीमी रफ्तार में चलने वाली कारें और बाइक, सामान्य गति से चलने वाले वाहनों की तुलना में लगभग चार गुना ज्यादा प्रदूषण फैलाती हैं।​

पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक एक सामान्य कार एक लीटर पेट्रोल या डीजल जलाकर करीब 1.5 ग्राम प्रति घन मीटर सूक्ष्म कण वायु में छोड़ती है और लगभग 130 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करती है। जब यही कार पहले या दूसरे गियर में जाम में रेंगती है तो यही उत्सर्जन कई गुना बढ़ जाता है और हवा और ज्यादा खराब हो जाती है।​

शादियों और पटाखों ने बढ़ाई मुसीबत

सर्दियों की शुरुआत के साथ ही शादी का मौसम भी जोर पकड़ चुका है। शहर में रोजाना सैकड़ों शादियां हो रही हैं, जिनमें पटाखों, सजावटी रोशनी और बड़े स्तर पर तंदूर व कड़ाहियों में खाना बनाने से खूब धुआं निकल रहा है।​

विशेषज्ञों का कहना है कि कई दिनों से लगातार चल रही शादियों में पटाखों के धुएं, तंदूरों की आग और वाहनों की भीड़ ने मिलकर वायु गुणवत्ता को और ज्यादा खराब कर दिया है। देर रात तक चलने वाले इन आयोजनों की वजह से रात के समय प्रदूषण का स्तर तेजी से ऊपर जा रहा है।​

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आसान उपाय क्या कर सकते हैं आप

सरकार और एजेंसियों के साथ साथ आम लोगों की भूमिका भी बहुत जरूरी है। विशेषज्ञ कुछ सरल कदम सुझाते हैं जिन्हें अपनाकर आम नागरिक भी योगदान दे सकते हैं, घरों और दुकानों के बाहर कचरा या पत्तियां न जलाएं. तंदूर, लकड़ी या कोयले की जगह जहां संभव हो गैस या बिजली का प्रयोग करें. छोटी दूरी पर बाइक या कार की जगह पैदल चलें या साइकिल इस्तेमाल करें. कार शेयरिंग और पब्लिक ट्रांसपोर्ट को प्राथमिकता दें. गाड़ी की सर्विस समय पर कराएं और प्रदूषण जांच प्रमाणपत्र हमेशा वैध रखें. निर्माण कार्य पर पानी का छिड़काव और ढककर रखना सुनिश्चित करें. ये छोटे कदम मिलकर हवा की गुणवत्ता में बड़ा फर्क ला सकते हैं, खासकर सर्दियों के महीनों में जब प्रदूषण पहले से ही ज्यादा रहता है।​

सख्त कदमों की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ सलाह से काम नहीं चलेगा, प्रशासन को भी सख्त कदम उठाने होंगे। इसमें बिना कवर के निर्माण स्थलों पर जुर्माना, गैरकानूनी भट्ठों और तंदूरों पर कार्रवाई, ज्यादा प्रदूषण वाली गाड़ियों पर प्रतिबंध, और घनी आबादी वाले इलाकों में ट्रैफिक प्लानिंग जैसी नीतियां शामिल हो सकती हैं।​

इसके साथ ही रियल टाइम AQI डिस्प्ले बोर्ड, स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान, और स्वास्थ्य विभाग की तरफ से संवेदनशील समूहों के लिए एडवाइजरी जारी करना भी जरूरी है, ताकि लोग समय पर सावधानी बरत सकें।​

देहरादून जैसी शांत वादियों में अगर AQI 300 के पार जा रहा है, तो यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, आने वाले खतरों की गंभीर चेतावनी है। तंदूर, गाड़ियां, शादियां, ठंडी रातें और लापरवाही मिलकर हवा को जहर बना रही हैं। अगर अभी सरकार, विशेषज्ञ और आम लोग मिलकर ठोस कदम नहीं उठाते, तो यह पहाड़ी शहर भी महानगरों जैसी स्मॉग की चादर में लिपट सकता है।​

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